छोटे शब्द इतना दर्द क्यों देते हैं?
यह बहुत अजीब बात है, बहुत ही विचित्र विरोधाभास है। एक पत्थर आपको उतना दर्द नहीं देता, लेकिन एक छोटा-सा शब्द आपको भीतर तक हिला देता है। एक कांटा आपको इतनी गहराई से घायल नहीं करता, लेकिन एक लापरवाह वाक्य कयी दिनों तक आपके भीतर दर्द देता रहता है। क्योंकि शब्द आपके शरीर को नहीं छूता। वह किसी और चीज़ को छूता है , शब्द जिसका शायद आंखों से देखना मुश्किल है फिर भी दर्द दे बैठता हैं आपकी पहचान को, आपकी "मैं कौन हूँ" वाली धारणा को। क्योंकि शरीर मजबूत होता है, वह ठीक हो सकता है। लेकिन आपकी पहचान बहुत नाज़ुक होती है, अहंकार बड़ा होता क्योंकि ये सब वास्तविक नहीं है। ये सिर्फ एक विचार है जिसे आप अपने बारे में ढोते रहते हैं। और जिस दिन किसी के शब्द उस विचार को चुनौती या कुछ बोल देते हैं, तो शायद आप डर या सहम जाते हैं। अब इस फर्क को साफ-साफ समझिए। अगर कोई आप पर पत्थर फेंकता है, तो आप उसका घाव दिखा सकते हैं। वह दिखाई देता है, वह सीधा-सा मामला है। लेकिन जब कोई कहता है कि "तुम बेकार हो" या "तुम काफी नहीं हो" — या यहाँ तक कि एक छोटा-सा मज़ाक भी — तो आप वह घाव किसी को दिखा नह...